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International Journal of Advanced Research in Education and TechnologY(IJARETY)
International, Double Blind-Peer Reviewed & Refereed Journal, Open Access Journal
|Approved by NSL & NISCAIR |Impact Factor: 8.152 | ESTD: 2014|

|Scholarly Open Access Journals, Peer-Reviewed, and Refereed Journal, Impact Factor-8.152 (Calculate by Google Scholar and Semantic Scholar | AI-Powered Research Tool), Multidisciplinary, Bi-Monthly, Citation Generator, Digital Object Identifier(DOI)|

Article

TITLE The Role of Peasant Movements in the Indian Freedom Struggle: A Historical Study
ABSTRACT भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों और समुदायों की सहभागिता से निर्मित हुआ। इस व्यापक संघर्ष में किसान आंदोलनों की भूमिका विशेष महत्व रखती है, क्योंकि औपनिवेशिक भारत की विशाल आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती थी और कृषि उनकी आजीविका का प्रमुख आधार थी। ब्रिटिश शासन की भूमि-राजस्व नीतियों, जमींदारी एवं मध्यस्थ व्यवस्थाओं, साहूकारी ऋण, बेदखली, जबरन अथवा लाभहीन नकदी फसल उत्पादन, बेगार और विभिन्न प्रकार के स्थानीय करों ने ग्रामीण समाज में आर्थिक दबाव बढ़ाया। इस दबाव से उत्पन्न असंतोष अलग-अलग क्षेत्रों में विविध रूपों में व्यक्त हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी का नील विद्रोह, पाबना कृषक आंदोलन और दक्कन विद्रोह प्रारंभिक प्रतिरोध की महत्वपूर्ण कड़ियाँ थे। बीसवीं शताब्दी में चंपारण, खेड़ा, अवध और बारडोली जैसे आंदोलनों ने किसान प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के निकट ला दिया। राजस्थान में बिजोलिया और बेगूँ जैसे आंदोलनों ने रियासती-सामंती संरचनाओं के विरुद्ध दीर्घकालीन जनचेतना विकसित की। 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के गठन ने कृषक राजनीति को अखिल भारतीय संगठनात्मक आधार दिया। 1940 के दशक के तेभागा और तेलंगाना आंदोलनों ने भूमि, बंटाई और ग्रामीण सत्ता-संबंधों को अधिक प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रश्न बनाया। इस शोध-पत्र का उद्देश्य अलग से निर्धारित उद्देश्यों की सूची प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक घटनाओं के क्रम और उनके पारस्परिक संबंधों के माध्यम से यह विश्लेषित करना है कि किसान संघर्षों ने राष्ट्रीय आंदोलन को किस प्रकार सामाजिक आधार, राजनीतिक ऊर्जा और ग्रामीण जनभागीदारी प्रदान की। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि किसान आंदोलनों की प्रेरणा अक्सर स्थानीय आर्थिक शिकायतों से हुई, परंतु संगठन, राष्ट्रीय राजनीति और स्वराज की अवधारणा के संपर्क में आने के बाद इन संघर्षों का अर्थ व्यापक हुआ। इन आंदोलनों ने किसानों में अधिकार-बोध, संगठनात्मक क्षमता और राजनीतिक चेतना विकसित की तथा स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार और कृषक अधिकारों के विमर्श के लिए आधार तैयार किया।
AUTHOR Dr. Sushil Kumar Assistant Professor, Department of History, Govt. College Krishan Nagar, Mahendergarh (Haryana), India
VOLUME 13
DOI DOI:10.15680/IJARETY.2026.1305008
PDF 8_The Role of Peasant Movements in the Indian Freedom Struggle A Historical Study.pdf
KEYWORDS
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